बुधवार, फ़रवरी 21, 2018

जो हो न सका मेरा, मुझे वो मुक़ाम याद आया

चाहतों के सफ़र में हुआ अंजाम याद आया 
जो हो न सका मेरा, मुझे वो मुक़ाम याद आया।

भुलाने से भी भूलते नहीं तेरे सितम मुझको 
जब भी मिला ज़ख़्म कोई, तेरा नाम याद आया।

सूख चुके आँखों के सागर को मौसमे-बारिश में 
मुहब्बत में मिला अश्कों का इनाम याद आया ।

सरे-बाज़ार तमाशा देखने आई भीड़ देख 
हर मोड़ पर मिलने वाला सलाम याद आया।

किसको फ़िक्र होनी थी मेरे बेगुनाह होने की 
बस लगाया वही, जिसको जो इल्ज़ाम याद आया।

बदक़िस्मती से मैं क्या हारा, अब मुझे देखकर 
हर किसी को ‘विर्क’ कोई-न-कोई काम याद आया।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, फ़रवरी 14, 2018

दर्द सहा इतना कि हो गया हूँ पत्थर

ऐ ख़ुदा ! तेरी ख़ुदाई का न रहा डर 
दर्द सहा इतना कि हो गया हूँ पत्थर।

वो अच्छाई का लिबास ओढ़े हुए था 
तिलमिलाना तो था ही उसे सच सुनकर। 

जहाँ से चला था, वहीं लौट आया हूँ 
न मैं बदला, न ही बदला मेरा मुक़द्दर।

हालात बदल न पाया बेबस आदमी 
रोती रही ज़िंदगी अपने हाल पर ।

वफा-बेवफ़ाई, नफ़रत-मुहब्बत में से 
न जाने कब कौन दिखा दे असर। 

कैसा हाल है मेरा अब क्या बताऊँ 
थोड़ा-थोड़ा ‘विर्क’ रोज़ रहा हूँ मर।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, फ़रवरी 07, 2018

हमारे दरम्याँ इतना फ़ासिला नहीं होता

मुझसे मुँह मोड़कर, तू अगर दूसरी तरफ़ चला नहीं होता 
तो कभी भी हमारे दरम्याँ इतना फ़ासिला नहीं होता ।

ये बात और है, उन्हें शौक है बंदूक उठाने का वरना 
मिल-बैठकर हल न निकले, ऐसा कोई मसला नहीं होता।

कोई आएगा साथ तुम्हारे, इसका इंतज़ार क्यों है ?
सच्चाई की राह चलने वालों का क़ाफ़िला नहीं होता ।

ज़रूरत नहीं किसी बड़े फ़लसफ़े की, बस काफ़ी है ये 
बुरा न करना किसी का, गर तुझसे भला नहीं होता । 

कोशिश तो करके देखो, हालात बदलते देर नहीं लगती 
अँधेरा है तब तक, जब तक कोई चिराग़ जला नहीं होता।

मुखौटों के दौर में ‘विर्क’ बड़ा मुश्किल है एतबार करना 
बदले-बदले नज़र आएँ, जिनका कुछ भी बदला नहीं होता।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 17, 2018

आसमां बिजली गिराने को है

ये दिल मचलकर बाहर आने को है
इसकी बेबसी मुझे रुलाने को है । 

ज़माने ने छीन ली है छत सिर से 
और आसमां बिजली गिराने को है।

उलझ गया हूँ मैं, कोई बताए मुझे 
क़सम खाने को है या निभाने को है।

लापरवाहियाँ मैंने छोड़ी ही नहीं 
तमाशबीन फिर आग लगाने को है।

अमन, ख़ुशी, प्यार की उम्मीदों का महल 
दहशत के इस दौर में चरमराने को है ।

किसी को भी अब परवाह नहीं इसकी 
वफ़ा का फूल ‘विर्क’ मुरझाने को है।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, जनवरी 10, 2018

बड़ा मुश्किल है बनाना घर

आँधी, तूफ़ां और सूरज की तल्ख़ियाँ झेलकर 
देखो उसे, छाँव दे रहा है हमें जो शजर ।

नींव में डालनी पड़े हैं अक्सर ख़ुद की ख़ुशियाँ 
मकां बना लोगे, बड़ा मुश्किल है बनाना घर ।

वक़्त तो लगता ही है, बीज को शजर होने में 
अच्छे कामों का, देर बाद दिखाई दे असर ।

किसी को हक़ नहीं दूसरे पर हुकूमत का 
जी ऐसे, न किसी को डरा, न किसी से डर।

मासूम होना कोई गुनाह तो नहीं, फिर भी 
बदलते हुए हालातों पर भी, रख थोड़ी नज़र।

माना ‘विर्क’ तेरा पेशा है नसीहतें देना 
मगर ख़ुद को सुधारने की भी कर फ़िक्र।

दिलबागसिंह विर्क 
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