बुधवार, दिसंबर 13, 2017

दिल दिल न रहा, पत्थर हो गया है शायद

तेरी बेरुखी का असर हो गया है शायद 
दिल दिल न रहा, पत्थर हो गया है शायद।

जीतने की सब कोशिशें दम तोड़ती रही 
हारना मेरा मुक़द्दर हो गया है शायद।

वफ़ा, मुहब्बत, एतबार खो गये हैं कहीं 
ईंट-पत्थर का मकां, घर हो गया है शायद

ख़ुशियों के सब किलों को जीतता जा रहा है 
ग़म तो दूसरा सिकंदर हो गया है शायद

आदमी ने ‘विर्क’ छोड़ दी है आदमियत 
इसलिए ख़ुदा का क़हर हो गया है शायद।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, दिसंबर 06, 2017

प्यार भरा दिल दग़ाबाज़ नहीं होता

न चाहो ताज, सबके सिर पर ताज नहीं होता 
मिले मुहब्बत, इससे बढ़कर एजाज़ नहीं होता।

परहेज़ ही काम करता है इस इश्क़ में यारो 
इस मर्ज़ के मरीज़ का इलाज नहीं होता। 

अश्क बहाते, ग़म उठाते हैं लोग वहाँ के 
वफ़ा निभाना यहाँ का रिवाज नहीं होता।

हिम्मत हो पास तो अभी मुमकिन है सब कुछ 
कल कैसे होगा वो काम, जो आज नहीं होता

चेहरे पे मासूमियत झलकती है ख़ुद-ब-ख़ुद 
सीने में छुपाया जिसने राज़ नहीं होता।

यही ख़ासियत इसकी, इस पर एतबार करना 
प्यार भरा दिल ‘विर्क’ दग़ाबाज़ नहीं होता।

दिलबागसिंह विर्क 
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बुधवार, नवंबर 29, 2017

जो झूठा होता है, वही बात बनाता है अक्सर

मेरे ख़्वाबों में तेरा चेहरा मुसकराता है अक्सर 
ग़म पागल दिल पर हावी हो जाता है अक्सर।

सच को कब ज़रूरत पड़ी किन्हीं बैसाखियों की 
जो झूठा होता है, वही बात बनाता है अक्सर ।

लाठी वाले जीतते रहे हैं यहाँ पर हर युग में 
इतिहास का हर पन्ना यही क़िस्सा सुनाता है अक्सर।

भले ही दामन भरा हो ख़ुशियों से, मगर ये सच है 
दर्द का लम्हा सबको अपने पास बुलाता है अक्सर।

जो हो चुके पत्थर वे क्या जाने अहमियत जज़्बातों की 
दिल तो दिल है ‘विर्क’, रोता है, तड़पाता है अक्सर।

दिलबागसिंह विर्क
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बुधवार, नवंबर 22, 2017

वो बात-बात पर हँसता है

वो बात-बात पर हँसता है 
लोगों को पागल लगता है।

आज हो रहा ये अजूबा कैसे 
आँधियों में चिराग़ जलता है।

सिकंदर होगा या फिर क़लंदर
जो दिल में आया, करता है।

वक़्त के साँचे में ढलते सब 
क्या वक़्त साँचों में ढलता है ?

सुना तो है मगर देखा नहीं 
पाप का घड़ा भरता है।

उसूलों की बात मत छेड़ो 
यहाँ पर ‘विर्क’ सब चलता है।

 दिलबागसिंह विर्क 
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मंगलवार, नवंबर 14, 2017

कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर

मुझे ख़ुदा न समझना, कहा था मैंने मगर 
तूने पागल समझा मुझे, किसके कहने पर।

मुझ पर अब ज़रा-सा यक़ीं नहीं रहा तुझको
क्या इससे बढ़कर होगा क़ियामत का क़हर।

बस ये ही बेताब हैं गले मिलने को वरना 
नदियों का इंतज़ार कब करता है सागर।

बेवफ़ाई आबे-हयात है तो, हो मुबारक तुझे 
मुझे तो मंज़ूर है, पीना वफ़ा का ज़हर।

इसका इलाज तो ढूँढना ही होगा, आख़िर
कब तक डराएगा, तेरे बिना जीने का डर।

तेरी असलियत को जानती है सारी दुनिया 
विर्क’ यूँ ही अच्छा बनने की कोशिश न कर।

दिलबागसिंह विर्क 
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