बुधवार, अक्तूबर 18, 2017

जो तेरे साथ बीती, ज़िंदगी वही थी

प्यार भरे दिलों में दीवार उठी थी 
दूर हो गये हम, कैसी हवा चली थी। 

एक मोड़ पर आकर हाथ छूट गया 
भरी दोपहर में एक शाम ढली थी।

महफ़िल में आया जब भी नाम तेरा 
मेरे सीने में एक कसक उठी थी । 

हर बीता दिन गहरे ज़ख़्म दे गया 
दम तोड़ती रही, जो आस बची थी।

दिन तो अब भी कट रहे हैं किसी तरह 
जो तेरे साथ बीती, ज़िंदगी वही थी।

बस यही सोचकर ख़ुश हो लेते हैं हम 
जुदा होकर ‘विर्क’ तुझे ख़ुशी मिली थी।

******
दिलबागसिंह विर्क 

बुधवार, अक्तूबर 11, 2017

दिल तो आख़िर दिल है, एक बार तड़पा होगा

उसकी महफ़िल में जब मेरा ज़िक्र हुआ होगा 
उसकी ख़ामोशियों ने कुछ तो कहा होगा।

क़समें वफ़ा की भुलाना आसां तो नहीं होता 
दिल तो आख़िर दिल है, एक बार तड़पा होगा।

जिनकी मतलबपरस्ती ने किया बदनाम इसे 
ख़ुदा मुहब्बत का ज़रूर उनसे ख़फ़ा होगा। 

प्यार करके मैंने क्या पाया, तुम ये पूछते हो 
मेरी रुसवाई का चर्चा तुमने सुना होगा।

दिल को यारो अब किसी का एतबार न रहा 
इससे बढ़कर भी क्या कोई हादसा होगा।

इस दर्द का अहसास तो होगा ‘विर्क’ तुम्हें
उम्मीदों का चमन कभी-न-कभी उजड़ा होगा।

दिलबागसिंह विर्क 
******

बुधवार, अक्तूबर 04, 2017

कभी खींच लिया दोस्तों ने, कभी फिसल गए

ये तो ख़बर नहीं, आज गए या कल गए 
ख़ुशी जब मेहमान थी, गुज़र वो पल गए।

उनसे पूछो तुम वफ़ा के मा’ने क्या हैं 
अरमानों को जिनके हमदम कुचल गए।

शिखर पर पहुँचा न गया हमसे बस इसलिए 
कभी खींच लिया दोस्तों ने, कभी फिसल गए।

हमें हराया हालातों से लड़ने की ज़िद ने 
जीत हुई उनकी, जो बचकर निकल गए।

ये दौर, हैरतअंगेज़ कारनामों का है 
यहाँ खरे लुढ़कते रहे, खोटे चल गए

ज़िंदगी ‘विर्क’ इस तरह गुज़रती रही 
फिर ठोकर खाई, जब लगा संभल गए।

दिलबागसिंह विर्क 
******

रविवार, सितंबर 24, 2017

कीमत

( विश्व हिंदी सचिवालय मोरिशस द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कहानी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानी )

" अभी तो मेरे हाथों की मेहँदी भी नहीं उतरी और आप …." - शारदा ने अपने आंसू पोंछते हुए डबडबाई आवाज़ में अपने पति राधेश्याम से पूछा ,लेकिन राधेश्याम ने उसे बात पूरी नहीं करने दी और बीच में ही उसे टोकते हुए बोला – " तुम सारी की सारी औरतें ही एक जैसी होती हो , मैं तुम्हारी मेहँदी को देखता रहूँ या कुछ कमाई करूं ? "
" कमाई तो यहाँ भी हो सकती है |"
" यहाँ क्या खाक कमाई होती है , खेत में फसल तो होती नहीं , कर्ज़ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, अगर कुछ दिन और खेती से कमाई की उम्मीद में बैठे रहे तो ये रही – सही जमीन भी बिक जाएगी | "

बुधवार, सितंबर 20, 2017

हिम्मत तो की होती बुलाने की

चुन ली राह ख़ुद को तड़पाने की 
क्यों की ख़ता तूने दिल लगाने की।

ये हसीनों की आदत होती है 
चैन चुराकर नज़रें चुराने की।

जिन्हें घर भरने से फ़ुर्सत नहीं 
वो क्या करेंगे फ़िक्र ज़माने की।

हम न आते तो गिला भी करते 
हिम्मत तो की होती बुलाने की।

चाहा ही नहीं हालात बदलना 
सब कोशिशें हैं, जी बहलाने की।

आदमी को ‘विर्क’ समझा ही नहीं 
चाहत दिल में ख़ुदा को पाने की। 

दिलबागसिंह विर्क 
******

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...